मौलिक ज्ञान

हवन क्या है ?

वेदों और धर्म शास्त्र (मनु स्मृति) के अनुसार व रामायण और महाभारत (इतिहास की पुस्तकें) के अनुसार देव पूजन एक ही विधि से करने की आज्ञा है-वह विधि है अग्निहोत्र। हवन से जल और वायु की शुद्धि होती है जिससे रोगों का निवारण होता है। इसलिए अग्निहोत्र दूसरों के भले के लिए किया जाने वाला सबसे अच्छा कर्म है।

मनुष्य को स्वस्थ और सुखी रहने के लिए जल और वायु की स्वच्छता परम आवश्यक है। कहीं दूर जाना हो तो सबसे पहले वहां का जलवायु ही पूछा जाता है, क्योंकि यदि वहां का जलवायु (जल और वायु) ठीक है तो वहां पर स्वस्थ रह सकेंगे। आज संसार में जल और वायु की अशुद्धि एक बड़ी भारी समस्या बनी हुर्इ है। वैदिक संस्कृति में हवन इस समस्या का सर्वोत्तम समाधान है। पुराने समय में ऋषि, मुनि, राजे, महाराजे तथा प्रजा प्रतिदिन प्रात: सायं हवन किया करते थे। यज्ञ और हवन पर्यायवाची शब्द माने जाने लगे हैं। वस्तुत: हर वह कर्म जो परोपकार के लिए किया जाता है वह यज्ञ कहलाता है। उस रीति से हवन को यज्ञ कहना कुछ गलत नहीं। परन्तु हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि यज्ञ केवल हवन ही नहीं है।

हवन में सब अच्छे-अच्छे पदार्थ अग्नि में ही क्यों डाले जाते हैं ? जैसे शरीर के लिए सब शुभ पदार्थों को अंग विशेष पर न लगाकर के, मुख में डाला जाता है जहां से वे हमारे पेट में पहुंचते हैं। पेट के भिन्न-भिन्न अवयव उन पदार्थों में से हमारे शरीर के लिए उपयोगी तत्वों को निकालकर उन्हें इस लायक बना देते हैं कि वे हमारे खून में मिल सकें। खून के माध्यम से वे तत्व भिन्न-भिन्न अंगो को प्राप्त होते हैं। ठीक ऐसे ही अच्छे-अच्छे पदार्थों को जल, वायु आदि में न डाल कर अग्नि में डाला जाता है। अग्नि में यह शक्ति है कि वह उसमें डाले हुए पदार्थों को सूक्ष्म तत्वों में विघटित कर, उनको गर्म कर हल्का कर देती है। ये हल्के हुए सूक्ष्म तत्व हवा में मिलकर दूर-दूर फैल जाते हैं और हवा को शुद्ध करते हैं। जो जलीय भाग होता है वह भी हवा के सहारे ऊपर उठकर बादल बन जाता है। फिर वर्षा के रूप में भूमि पर वापिस आता है। वर्षा के इस शुद्ध जल में फल, सब्जियां, वनस्पतियां आदि भी रोगनाशक होती हैं। अग्नि द्वारा अपने सम्पर्क में आए वातावरण को गर्म कर हल्का कर देना उसकी भेदन शक्ति का आधार है। इसी क्रिया के कारण, हमारे घरों की हवा जो हमारे सांस आदि लेने से गंदी हो जाती है, स्वच्छ हवा द्वारा परिवर्तित हो पाती है। घी, केसर आदि पुष्टि वर्धक पदार्थों के सेवन से इसका एक अंश भी लाभ नहीं होता। अब यह कहना कि यदि हवन इतना लाभप्रद है तो खान-पान को छोड़, सभी खाने-पीने के योग्य पदार्थों को हवन क्यों नहीं कर देना चाहिए। ऐसा कहना कुतर्क की श्रेणी में आता है। हवन में चन्दन, आम आदि की समिधा (लकड़ी) का प्रयोग करने का तात्पर्य इतना है कि इनके जलने से दुर्गन्ध और धुआँ अधिक नहीं होता।

हवन करने से मनुष्य को पाप लगता है। मनुष्य के शरीर से दुर्गन्ध निकलकर जितना जल, वायु आदि अशुद्ध होकर रोग उत्पत्ति करता है तथा प्राणियों को दु:ख देता है उतना पाप लगता है। केवल अपने शरीर से ही नहीं अपितु अपने सुख के लिए रखे पशु इत्यादि से भी जो दुर्गन्ध उत्पन्न होता है उसके पाप का भागी मनुष्य ही होता है। इसलिये उस पाप के निवारणार्थ कम से कम उतना सुगन्ध जल और वायु में फैलाना चाहिये।