मौलिक ज्ञान

संक्षेप मे कर्मफल सिद्धान्त क्या है ?

  पहली विचारधारा

कुछ विद्वानों की मान्यता है-

     हमें सुख दुःख की प्राप्ति हमारे पूर्वकृत कर्मों के फलस्वरूप ही होती है। इस विचारधारा के अनुसार कर्म अन्यों के सुख दुख के एक ही साथ निमित्त भी होते हैं और कारण भी। कर्मों के निमित्त व कारण होने का अर्थ इस निबन्ध को पूरा पढ़ने पर स्पष्ट हो जाएगा।

 आपत्तियां-

-यह मान्यता रखने पर जीव की कर्म करने की स्वतन्त्रता पर प्रश्न उठता है।

-अन्यों द्वारा दिया सुख दुःख भी ईश्वर प्रदत्त हो तो अन्यों को ईश्वर की कठपुतली या ईश्वर का सहयोगी मानना पड़ता है।

-इस मान्यता के आधार पर बम आदि से लोगों की दुर्घटनावश हुई मृत्यु व आत्महत्याओं का कोई तर्कपूर्ण उत्तर नहीं मिलता।

-इस मान्यता के आधार पर यदि ईश्वर मनुष्यों को उनके कर्मों के अनुसार सुख दुःख प्रदान करता है तो यह सिद्ध होता है कि ईश्वर कर्मफल देने के लिए जीवों का सहयोग लेता है जबकि ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता का अर्थ ही यह लिया जाता है कि ईश्वर को अपने किसी भी कार्य को करने के लिए किसी अन्य की सहायता की आवश्यकता नहीं है।

दूसरी विचारधारा

कुछ विद्वानों की मान्यता है-

     मनुष्य को अपने कर्म के फल के रूप में (अन्य मनुष्यों से अन्ततः ईश्वर से) सुख दुःख मिलते ही हैं। हमें अन्यों के कर्मों के परिणाम व प्रभाव स्वरूप भी सुख दुःख प्राप्त होता है जो हमने कमाया नहीं होता। यह सुख दुःख हमारे पूर्वकृत कर्मों का ईश्वर प्रदत्त फल नहीं होता। इस विचारधारा के अनुसार कर्म अन्यों के सुख दुख के कारण होते हैं निमित्त नहीं।

     कर्म के फल, परिणाम और प्रभाव की परिभाषा

1.कर्म का फल:-कर्म पूरा हो जाने पर, कर्म के अनुरूप, अच्छे या बुरे कर्म के कर्त्ता को जो न्यायपूर्वक, न कम न अधिक, र्इश्वर, राजा, गुरू, माता-पिता, स्वामी आदि के द्वारा सुख-दु:ख, या सुख-दु:ख को प्राप्त करने के साधन प्रदान करना कर्म का फल कहलाता है।

उदाहरण- किसी घी विक्रेता ने वनस्पति घी में पशु की चर्बी मिलाकर विक्रय किया। पकड़े जाने पर राजा द्वारा 19 वर्ष की कठोर सजा दी गर्इ तथा 19 लाख रूपयों का दण्ड किया गया। यह कर्म का फल है।

2. कर्म का परिणाम:- क्रिया करने के तत्काल पश्चात की जो प्रतिक्रिया है, उसे ''कर्म का परिणाम कहते हैं। जिस व्यक्ति या वस्तु से सम्बन्धित क्रिया की होती है कर्म का परिणाम उसी व्यक्ति या वस्तु पर होता है।

उदाहरण- चर्बी मिश्रित नकली घी के विकृत हो जाने पर खाने वाले सैकड़ों-हजारों व्यक्ति रोगी हो गये, अन्धे हो गए। यह घी विक्रेता के मिलावट का परिणाम है कि जिन्होंने घी खाया वे तो रोगी हुए, अन्य जिन्होंने नहीं खाया वे स्वस्थ ही रहे।

उदाहरण-चालक द्वारा शराब पीकर बस चलाने से दुर्घटना हुर्इ, इसके होने पर पाँच व्यक्ति मारे गये, दस घायल हो गये,  बीस को चोटें आर्इ। यह सब कर्म का परिणाम है। उन सबको दु:ख की अनुभूति हुर्इ। उनके अनेक कार्य और योजनाएँ असफल हुर्इ। चिकित्सा आदि में बहुत समय और धन लगा। यह सब कर्मों का परिणाम है। चालक को शराब पीकर बस चलाने और उसे दुर्घटनाग्रस्त कर देने रूप कर्म का फल तो शासक या र्इश्वर बाद में देगा।

3.कर्म का प्रभाव:- किसी क्रिया, उसके परिणाम या फल को जानकर अपने पर या दूसरों पर जो मानसिक सुख-दु:ख, भय, चिन्ता, शोक आदि का असर होता है। उसे कर्म का प्रभाव कहते हैं। जब तक सम्बंधित व्यक्ति को क्रियादि का ज्ञान नहीं होगा तब तक उस पर कोर्इ प्रभाव नहीं होगा।

उदाहरण-वनस्पति घी में पशु की चर्बी मिलाकर गाय का घी बनाकर बेचने वाला व्यापारी जब पकड़ा जाता है तो उसके घर वाले सगे संबंधी मित्रादि दु:खी होते हैं तथा उसके शत्रु,  धार्मिक सज्जन सुखी होते हैं। बाजार में मिलने वाले गाय के घी पर आम जनता का संशय और अविश्वास हो जाता है। यह भी प्रभाव है।

         कर्म के परिणाम, प्रभाव और फल को एक ही दृष्टांत में निम्न प्रकार से समझ सकते हैं-

उदाहरण-बार-बार मना करने पर भी बालक चाकू से खेल रहा था और खेलते-खेलते चाकू से बालक से अंगुली कट गयी, अंगुली कटने पर खून निकला। खून को देखकर पास में बैठा बालक रोने लगा। रोना सुनकर थोड़ी दूर खड़ी बालक की माता आयी और चाकू से खेल रहे बालक की अंगुली कटी देखी। यह देख कर माता ने बालक को दो थप्पड़ लगाए। यहाँ दृष्टांत में बालक की अंगुली का कटना कर्म का परिणाम है, क्योंकि यह क्रिया के तत्काल बाद हुर्इ प्रतिक्रिया है। पास में बैंठे छोटे बालक का रोना कर्म का प्रभाव है, क्योंकि यह अंगुली कटने व अंगुली से खून का निकलने का असर है। माता द्वारा बालक को थप्पड़ लगाना कर्म का फल है क्योंकि क्रिया के अनुरूप आज्ञा भंग करने का कर्त्ता बालक को थप्पड़ लगाना रूप दण्ड दिया गया है। कर्म का परिणाम प्राय: तुरन्त होता है पर प्रभाव व फल में समय लगता है। कर्इ बार अधिक और कर्इ बार बहुत अधिक समय भी लगता है।

 

उक्त विचारधारा महर्षि दयानन्द के निम्न प्रमाणों से विपरीत है-

1    सत्यार्थ प्रकाश के नवम् सम्मुलास में वे लिखते हैं-

     ‘‘देखो एक जीव विद्वान----दोष आता है।

2    सत्यार्थ प्रकाश के द्वादश सम्मुलास में वे लिखते हैं-

     ‘‘यदि ईश्वर फल प्रदाता----अन्य को भोगने पड़ेगें।‘‘

3    सत्यार्थ प्रकाश के एकादश सम्मुलास में वे लिखते हैं-

     ‘‘पूर्वापर जन्म न ----ईश्वर द्वारा प्राप्त होता है।

आपत्तियां-

-     जिस राज्य में कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे को बिना उसके कसूर के हानि पहुँचा सकता है, उस राज्य का राजा सशक्त और प्रभावशाली नहीं माना जाता। ईश्वर क्योंकि इस ब्रह्माण्ड का सशक्त और न्यायप्रिय राजा है इसलिए यह मानना कि कोई भी व्यक्ति किसी अन्य को बिना उसके अर्जित किए सुख दुःख दे सकता है दोषपूर्ण है।

तीसरी विचारधारा

कुछ विद्वानों की मान्यता है-

जीव जो भी सुख दुख भोगता है उनमें दो प्रकार के सुख दुख सम्मिलित रहते हैं—एक वे जो जीव को अपने कर्मफल से प्राप्त होते हैं, जिन्हें वह दूसरों के निमित्त से भोगता है और दूसरे प्रकार के वे हैं जो दूसरों के कर्मों के कारण प्राप्त होते हैं। जड़ पदार्थ कर्म-स्वतन्त्रता के अभाव में दूसरों के सुख दुख के निमित्त ही होते हैं जबकि चेतन पदार्थ दूसरों के सुख दुख के निमित्त भी होते हैं और कारण भी। सामान्य कर्त्तव्य तक ही मानवकर्म अन्यों के भोग  में निमित्त होते हैं जबकि उसे पूर्ण न करना, उससे अधिक परोपकार आदि शुभकर्म करना अथवा अशुभकर्म करना, इन तीन परिस्थतियों में मानवकर्म प्रभाव व परिणाम के रूप में अन्यों के भोग  में कारण होते हैं।

आपत्तियां-

इस विचारधारा के विरुध आपत्तियां भी दूसरी विचारधारा के समान हैं।

          कर्मफल जैसे गहन विषय पर 'वैदिक दर्शन' तो पहली विचारधारा के अनुरूप मान्यता ही है। इस मान्यता पर उठाई जाने वाली आपत्तियों के निवारणार्थ हम दूसरी व तीसरी विचारधारा के विद्वानों के विचारों की भी सहायता लेगें।

समाधान-  

-    ईश्वर संस्कारों, पिछले कर्मों आदि के आधार पर प्रत्येक जीवात्मा के सम्भावित कर्मों का अनुमान रखता है और अपने इसी अनुमान को वह उन जीवात्माओं के कर्मों के परिणाम व प्रभाव स्वरूप विशेष जीवात्माओं को सुख दुःख देने के लिए उपयोग करता है। ऐसा कहने में हमारा यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि ईश्वर जीवात्माओं को कुछ करने व कुछ न करने के लिए प्रेरित करता है। ईश्वर कभी भी किसी जीवात्मा को भी कुछ करने व कुछ न करने के लिए प्रेरित नहीं करता। उसकी तरफ से उत्साह, डर आदि प्रेरणायें तो व्यक्ति के किसी कर्म के करने के विचार के बाद उत्पन्न होती हैं। जीवात्मा का किसी कर्म को करने, न करने व उल्टा करने का विचार उसका अपना होता है। ईश्वर केवल आनन्द, बुद्धि, बल, धैर्य आदि ही उपासना के समय या मुसीबतकाल में की गई याचना के समय प्रदान करता है।

          कर्मफल सिद्धान्त की आधारभूत शर्त यह है कि कर्मफल पाने वाले को कर्म करने की स्वतन्त्रता हो। इस विचाराधारा में कि ईश्वर जीवात्माओं को कर्म करने, न करने व उल्टा करने में प्रेरित करता है में जीवात्मा के कर्म करने की स्वतन्त्रता का अभाव है। 

-         ईश्वर का जीवात्माओं की क्षमताओं व योग्यतायों का उपयोग अन्य जीवात्माओं के कर्मों के फल देने के लिए करना ईश्वर का अपने कर्मों में जीवात्माओं की सहायता लेना नहीं कहा जा सकता। ईश्वर ऐसा जीवात्माओं के कर्म-स्वातन्त्र्य पर प्रहार किए बिना करता है। इस बात को एक उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिए ईश्वर ने एक जीवात्मा ‘‘क’को उसके कर्मों के फलस्वरूप 100 इकाइयां दुःख देना है। अब ईश्वर ‘‘क’को यह दुख देने के लिए ‘‘ख’को जो ‘‘क’का सगा-सम्बंधी, दोस्त या अन्य कोई जीवात्मा हो सकता है, उसकी क्षमताओं के आधार पर चयन करता है। अब ‘‘ख’अपनी कर्म-स्वतन्त्रता के कारण  ‘‘क’को 100 इकाइयां या 100 से कम ज़्यादा इकाइयां दुःख भी दे सकता है परन्तु ईश्वर को ‘‘ख’की क्षमताओं व योग्यताओं का परिशुद्ध (अचूक) ज्ञान होने के कारण, ‘‘ख’ ‘‘क’को 100 इकाइयां दुःख ही देता है। ऐसा करने पर ‘‘ख’को ईश्वर के हाथ की कठपुतली कहना गलत है। ठीक इसी तरह, किसी जीवात्मा को सुख देने के लिए भी ईश्वर किसी अन्य जीवात्मा का चयन करता है। किसी जीवात्मा को ईश्वर द्वारा सुख देने को ही ईश्वर की कृपा कहा जाता है।

          जब तक किसी जीवात्मा द्वारा कर्म कर नही लिया जाता तब तक उस कर्म का ईश्वर को अनुमान तो होता है पर कोई ज्ञान नहीं होता। ईश्वर को कर्म का ज्ञान जीवात्मा द्वारा उस कर्म को कर चुकने के तुरन्त बाद हो जाता है। जीवात्मा ठीक ईश्वर के अनुमान के अनुसार कर्म करता है। यह इसलिए होता है क्योंकि ईश्वर, प्रत्येक जीवात्मा के संस्कारों, पूर्व कर्मों, परिस्थितयों, क्षमताओं, योग्यताओं आदि का विशुद्ध (ठीक-ठीक) ज्ञान रखता है। ईश्वर की सर्वज्ञता का यह अर्थ लेना कि उसे कर्म होने से पहले उस कर्म का ज्ञान होता है, सर्वथा अनुचित है।

-    जब यह कहा जाता है कि ईश्वर अपने कार्यों में किसी अन्य की सहायता नहीं लेता तो इसका यह तात्पर्य नहीं होता कि वह अपने कार्यों में इस ब्रह्माण्ड की चेतन व जड़ वस्तुओं का उपकरण की भांति उपयोग भी नहीं करता। किसी अच्छी जीवात्मा को सुख देने के लिए ईश्वर द्वारा उसको विद्वान व सम्पन्न माता पिता के घर जन्म देना अविवादित है। जब व्यक्ति अन्यों के कृत्य, बम आदि से मारे जाते है तो बम आदि फेंकने वाले व्यक्ति को ईश्वर का नोमाईन्दा कहना गलत है। ईश्वर ने तो उस व्यक्ति की अन्य जीवात्माओं को दुःख पहुंचाने की क्षमता का उपयोग मात्र किया होता है।

-    100 इकाइयों वाले ऊपर के उदाहरण को लेकर इस विषय को और अधिक गहराई से जानने का प्रयत्न करते हैं- मान लीजिए कि उपरेाक्त उदाहरण के अनुसार ‘‘ख’ ‘‘क’को 100 इकाइयां दुःख दे देता है परन्तु ईश्वरीय कृपा से ‘‘क’केवल 50 इकाइयां दुःख ही अनुभव कर पाता है तो भी ‘‘क’के खाते में 100 इकाइयां दुःख ही दर्ज होगा।

          दूसरी व तीसरी विचारधारा के अनुसार अन्यों के कर्म के प्रभाव व परिणाम स्वरूप जीवात्मा को अकारण दुःख पहुँचने के ईश्वर द्वारा आत्मरक्षा करने, नीति, चतुराई बर्तने, बलवान बनने आदि के उपदेश को पर्याप्त मानना अर्थहीन है।

          कर्मफल सिद्धान्त की बारीकियों के बारे में विद्वानों में मतभेद होने पर भी वे निम्नलिखित बातों पर एकमत हैं-

1    फल हमेशा कर्म के पश्चात् होता है। कर्म होने से पूर्व उसके फल की प्राप्ति असम्भव है।

2    केवल वहीं सत्ता कर्मफल देने की अधिकारी है जो कर्मफल देने की उपयोगिता, कर्मों की पूर्ण जानकारी व सम्बन्धित दण्डों की जानकारी रखती हो।

3    केवल विशेष व्यक्तियों को ही मुजरिमों को दण्ड घोषित करने और उसकी अनुपालना कराने का अधिकार होता है।

4    दण्ड प्राप्त व्यक्ति के पास दण्ड सहने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं होता जैसे लोक में निचली अदालत द्वारा दण्ड पाए जाने पर मुजरिम के पास केवल देश के उच्चतम न्यायलय तक ही जाने का अधिकार होता है।

5    जो लोग घोषित दण्ड के भुगाने में सहायक होते हैं, वे पारितोषिक न कि दण्ड के अधिकारी होते हैं जैसे लोक में जल्लाद आदि।

6    कोई भी कर्म कर्त्ता को उसका फल दिए बिना नहीं जाता।

7    कर्त्ता के पास कर्म को करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है परन्तु कर्म करने के पश्चात् कर्त्ता उस कर्म का फल पाने में परतन्त्र होता है। 

8    प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है। निष्काम कर्मों का फल लौकिक नहीं होता।

 

 

 

ऐसी भ्रान्ति है कि लौकिक दृष्टि में सब कुछ करने वाला र्इश्वर ही है व जीव कर्म करने में स्वतंत्र नहीं है परन्तु ऐसा है नहीं। कर्त्ता तो जीव ही है। र्इश्वर तो उसके कर्म करने का साक्षी मात्र है। प्रत्येक शरीरधारी मनुष्य में जीव के लक्षण घटते हैं, र्इश्वर के नहीं अत: महान से महान पुरूष भी र्इश्वर नहीं हो सकता।

मनुष्य के अतिरिक्त अन्य योनियों में कर्म-स्वतन्त्र्य नहीं होता। हालांकि उनके कर्म भी शाबाशी और दण्ड के हकदार होते हैं परन्तु मनुष्य के अतिरिक्त अन्य योनियों में कर्म-स्वतन्त्र्य के अभाव के कारण यह कह दिया जाता है मनुष्य के अतिरिक्त अन्य योनियों में किए गए कर्म कर्मफल को उत्पन्न करने वाले नहीं होते। अत: हम यह भी कह सकते है कि र्इश्वर केवल मनुष्य योनि में किए गए कर्मों का फल देता है। यह र्इश्वर निर्धारित करता है कि मनुष्य योनि में किए कर्मों का फल जीवात्मा को कब और किस योनि में अर्थात उसी मनुष्य योनि में व अगली मनुष्य योनि में व मनुष्य के अतिरिक्त किसी अन्य योनि में भुगतना है। क्योंकि मनुष्य के अतिरिक्त अन्य योनियों में किए कर्म कर्मफल को पैदा करने वाले नहीं होते व जीवात्मा द्वारा इन योनियों में की गर्इ प्रत्येक शारिरिक व मानसिक क्रिया उस जीवात्मा द्वारा मनुष्य योनि में किए गए कर्मों का फल होती हैं और उनको करने में जीवात्मा की इच्छा शामिल नहीं होती। इसलिए इन्हें (मनुष्य के अतिरिक्त अन्य योनियां) भोग योनियां कहा जाता है। मनुष्य योनि में जीवात्मा के पास कर्म की स्वतंत्रता के साथ-साथ कर्म फल भोगने की परतन्त्रता भी है।