मौलिक ज्ञान

तर्क और श्रद्धा क्या हैं व उनमें क्या सामंजस्य है ?

 जब हम किसी विषय को जान जाते हैं तो उस विषय के बारे में एक विश्वास सा पैदा होता है जिसे श्रद्धा कह दिया जाता है। किसी विषय को जानने के पश्चात पैदा हुर्इ श्रद्धा द्वारा ही उस विषय को आत्मसात् किया जा सकता है।

किसी विषय में श्रद्धा उस विषय को तर्क द्वारा सही-सही जानने के पश्चात ही उत्पन्न होती है। जो भावना किसी विषय को बगैर तर्क द्वारा जानने पर उत्पन्न होती हैं, उसे श्रद्धा कहना गलत है। तर्क के बगैर हम किसी भी विषय का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। यह जानते हुए भी यह धारणा बन गर्इ है कि अगर कोर्इ विषय र्इश्वर से संबन्धित है तो उसे जानने के लिए तर्क अथवा विवेक की कोर्इ आवश्यकता नहीं जो गलत है। हमारा र्इश्वर को ज्ञान स्वरूप मानना और उस ज्ञान स्वरूप र्इश्वर को पाने में ज्ञान की मुख्य भूमिका को भी मानना परन्तु ज्ञान दिलाने में सहायक तर्क अथवा विवेक को न मानना पूर्णतया असंगत है। तर्क की आवश्यकता को न मान कर हम पुराने समय में होने वाली शास्त्रार्थ की प्रक्रिया को निरर्थक ही सिद्ध करते हैं।