मौलिक ज्ञान

तर्क अथवा विवेक के आधार कहे जाने वाले प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द प्रमाण क्या हैं ?

 सबूतों को संस्कृत व हिन्दी भाषा में प्रमाण कहा जाता है। तर्क द्वारा अथवा दूसरे शब्दों में प्रमाणों द्वारा परीक्षा करने से हम किसी शंका का समाधान प्राप्त कर सकते हैं।  जब किसी विषय का ज्ञान हमारी ज्ञानेन्द्रियां (आंख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा) अथवा मन से सीधा हमारी आत्मा को होता है तो उसे प्रत्यक्ष कहते हैं। जब हमें यह ज्ञान हो कि दो क्रियाएं साथ-साथ होती हैं तो एक क्रिया का प्रत्यक्ष करके दूसरी क्रिया के होने का बोध हमें अनुमान प्रमाण से होता है। किसी का प्रमाण के रूप में इस्तेमाल शब्द प्रमाण कहलाता है। विषय की गहनता के अनुरूप हम व्यक्ति विशेष के कहे का प्रमाण के रूप में इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के तौर पर किसी बच्चे के लिए किसी विषय पर कहे उसके पिता के वचन ही प्रमाण होते हैं। इसी प्रकार एक व्यक्ति Physics की किसी अवधारणा को प्रमाणित करने के लिए किसी physicist के विचारों का सहारा लेता है।

र्इश्वर का साक्षात्कार योग वैज्ञानिकों को ही होता है, वही इस विषय में प्रमाण हैं।

स्थूल आंख आदि इन्द्रियों से स्थूल और साकार वस्तुएं ही दिखार्इ दे सकती है, सूक्ष्म नहीं। इसका अभिप्राय यह नहीं कि जो आंख से दिखायी न दे उसका अस्तित्व ही नहीं है। जैसे वायु सूक्ष्म  है, अत: आखों से नहीं देखी जा सकती, किन्तु उसका अस्तित्व है। इसका अनुभव त्वचा से होता है। इनसे भी सूक्ष्म हैं सुख-दुख, हर्ष, शोक, स्मृति, संस्कार, विचार आदि। इनकी अनुभूति केवल मन-आत्मा से होती है। योग वैज्ञानिकों द्वारा कहे और लिखे वचन इस विषय में शब्द प्रमाण हैं। साधारण अथवा सांसारिक जनों को साक्षात्कार न होने से, किसी वस्तु के विषय में यह नहीं कहा जा सकता है कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। जैसे-इलेक्ट्रोन न्यूट्रान आदि सूक्ष्म परमाणु, एक्सरे आदि सूक्ष्म किरणें, विभिन्न प्रकार की गैसें जगत में विद्यमान हैं, किन्तु दिखार्इ नहीं देती। उस विषय के विशेषज्ञ वैज्ञानिक विशेष प्रकार यन्त्रों द्वारा ही उन्हें देख और परख सकते है। पुन: वे उस विषयक ज्ञान को लेखों व प्रयोगों द्वारा अन्य साधारण जनों अथवा भावी पीढ़ियों को उपलब्ध कराते हैं। उन विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत सिद्वान्त और ज्ञान मान्य एवं प्रामाणिक होते हैं। उसी प्रकार योगविद्या का आविष्कार सर्वप्रथम वेदों और फिर अन्य मोक्ष शास्त्रों द्वारा हुआ। वेद और मोक्ष शास्त्र (दर्शन उपनिषद आदि) इस विषयक प्रामाणिक एवं मान्य ग्रन्थ हैं। योगीजन इस विषय के विशेषज्ञ हैं, उन्हें हम आज की शब्दावली में योग वैज्ञानिक, आत्म वैज्ञानिक अथवा परमात्म वैज्ञानिक भी कह सकते हैं, जैसे मन के ज्ञाताओं को मनोवैज्ञानिक कहते हैं। अत: उन द्वारा प्रोक्त अथवा लिखित सिद्धान्त एवं निष्कर्ष इस विषय में मान्य हैं और प्रामाणिक हैं।