मौलिक ज्ञान

ज्योतिष क्या केवल भविष्य जानने के ज्ञान का नाम है ?

इस ब्रह्माण्ड में जितने भी पिण्ड हैं चाहे वे स्वत: प्रकाशित हों अथवा अन्य से प्रकाशित हों, सब ज्योति कहलाते हैं। ज्योतियों के विषय से संबन्धित शास्त्र ज्योतिष कहलाता है। ज्योतिष शास्त्र के अन्तर्गत बीजगणित, अंकगणित, भूगोल, खगोल और भूगर्भ विधा आती है। जिनमें ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, ऋतुएं, उत्तरायण, दक्षिणायन, दिन, मास, वर्ष, युग, मन्वन्तर, कल्प, प्रलय आदि अनेक विषयों का अध्ययन किया जाता है। ज्योतिष एक विज्ञान होने से उसमें कोर्इ भी बात अटकल नहीं है। परन्तु इस ज्योतिष के नाम पर फलित ज्योतिष खड़ा किया गया है जिसका सम्बन्ध जीवों के कर्म फल से जोड़ा गया है। इस फलित ज्योतिष का 

उद्देश्य ही जीवों का भविष्य जानना, इष्ट लाभ और अनिष्ट परिहार (नष्ट करना) है। फलित ज्योतिष में भविष्य जानने के लिए जन्म पत्रिका, हस्त रेखा, राशि, ग्रह, नक्षत्र, शकुन, अंग स्फुरण, तिल और स्वप्न आदि को आधार बनाया जाता है। फलित ज्योतिष का वर्तमान में अत्यधिक प्रचार-प्रसार होने से ज्योतिष शब्द का अर्थ फलित ज्योतिष के अर्थ में रूढ़ (निश्चित) हो गया है। अशिक्षित जनों से लेकर शिक्षित जनों तक फलित ज्योतिष के द्वारा भविष्य फल देखने-दिखाने की प्रवृत्ति देखी जाती है। जो समाज में ज्योतिष विषयक फैले अज्ञान का परिचायक है। फलित ज्योतिष के द्वारा धूर्त लोग अनेक मिथ्या ग्रन्थ बना, लोगों को सत्य ग्रन्थों से विमुख कर अपने जाल में फँसाकर अपना उल्लु सीधा करते है।

रही शुभ-अशुभ की बात, तो यह जानना चाहिए कि किसी भी कार्य की सफलता के अनेक कारण होते हैं यदि एक भी कारण अपूर्ण रह जाये तो कार्य असफल हो जाता है। कार्य की सफलता के लिए उन सभी कारणों पर विचार करना अत्यावश्यक होता है। समय स्वयं में निरपेक्ष होता है इसलिये उसके शुभा शुभ का कोर्इ प्रश्न  ही नहीं उठता। हाँ, जिस समय जिस कार्य को करने की सुविधा हो और उसकी सफलता के सभी कारण उपलब्ध हों तो वह कार्य अवश्य ही पूर्ण हो जाता है। इसलिए उस उपयुक्त समय को ही शुभ समय कह दिया जाता है।

किसी भी आर्ष ग्रन्थ में नहीं लिखा है कि किसी विशेष दिन, तिथि या मास का कर्म फल से कोर्इ संबन्ध होता है। शास्त्रों में जहां कहीं भी किसी के लिए किसी विशेष समय का निर्दे मिलता है तो वहां जलवायु आदि के द्वारा होने वाले भौतिक प्रभाव के कारण ही विधान किया गया है न कि कर्म फल के संबन्ध को लेकर।

-डा0 धीरज कुमार आर्य

प्रकाशयुक्त अन्तरिक्ष पिण्ड को नक्षत्र कहा जाता है। हमारा सूर्य भी एक नक्षत्र है। ये नक्षत्र कोर्इ चेतन प्राणी नहीं हैं जो किसी व्यक्ति विशेष पर प्रसन्न या क्रोधित होते हैं।

नक्षत्रों का प्रभाव

प्रकृति की प्रत्येक वस्तु का प्रभाव अन्य सभी जड़ वस्तुओं पर पड़ता है जैसे सुन्दर फूल हमारे मन में उसे प्राप्त करने की चाह जगाने का सामर्थ्य  रखता है, पृथ्वी एक सीमा तक की सभी वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है। समुद्र में ज्वार-भाटा का आना भी सूर्य और चन्द्र की आकर्षण शक्ति का प्रभाव है। जीव शरीर, जो जड़ है, के द्वारा ही सब कार्य करता है। इस कारण से हम शरीर को जीव का आश्रय कह सकते हैं। पृथ्वी की आकर्षण शक्ति जब किसी प्राणी के जड़ शरीर को अपनी ओर खींचती है तो जीव के उस शरीर पर आश्रित होने के कारण वो भी पृथ्वी की ओर आकृष्ट हुआ प्रतीत होता है। वास्तव में जड़ वस्तुयें चेतन वस्तुओं (जीव और र्इश्वर) को प्रभावित करने का सामर्थ्य नहीं रखती। क्योंकि मन आत्मा के अत्याधिक निकट है इसलिए मन को प्रभावित करना जीवात्मा को प्रभावित करने के तुल्य मान लिया जाता है। कोर्इ भी जड़ पदार्थ जीवात्मा की कर्म-स्वतंत्रता के आड़े नहीं आ सकता। भोग-योनियों में फंसी जीवात्माओं को अपने जड़ शरीरों, जो अन्य जड़ वस्तुओं से प्रभावित भी हो सकते हैं, के अनुरूप ही कर्म करना पड़ता है अथवा कर्मफल भोगना पड़ता है। क्योंकि इन जीवात्माओं को कर्म-स्वतंत्रता का अधिकार नहीं होता इसलिए उनके द्वारा किए कर्म किसी प्रकार के कर्मफल को भी पैदा नहीं करते।

वेदों मे ज्योतिष

वेदों में आने वाले बुद्ध, बृहस्पति, शनि आदि शब्द ग्रहों के परिचायक नहीं। वेदों में ज्योतिष तो है परन्तु वह फलित ज्योतिष कदापि नहीं है। फलित ज्योतिष में यह माना जाता है कि या तो जीवों को कर्म करने की स्वतंत्रता है ही नहीं अगर है भी तो वह ग्रहों, नक्षत्रों के प्रभावों से कम है। फलित ज्योतिष का अस्तित्व न मानने के निम्नलिखित चार कारण हैं :-

- किसी के जन्म के समय की नक्षत्रों आदि की स्थित के आधार पर उसके जीवन में घटने वाली विवाह आदि भिन्न-भिन्न घटनाओं को जानना, यह मानना है कि जीवन में घटने वाली सभी घटनाएं पूर्व निर्धारित होती हैं और जीव को भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में कर्म करने की स्वतंत्रता नहीं है।

- किसी व्यक्ति के जन्म व विशेष घटना के बीच के अन्तराल में व्यक्ति की सोच, समझ, गुण, व्यवहार आदि में किसी परिवर्तन का न मानना बेहद अप्रगतिशील है।

- यह मानना कि नक्षत्रों की स्थिति का एक से अधिक जीवों के स्वास्थ्य, मानसिकता आदि पर प्रभाव एक समान होता है, हमारे अनुभव के विपरीत है। इस बात को एक उदाहरण से समझते हैं। हम देखते हैं कि ऋतु परिवर्तन के दौरान लोगों को सर्दी, जुकाम आदि होने की सम्भावना बढ. जाती है परन्तु ये बिमारियां सभी को समान अनुपात में नहीं होती।

- यदि हमारे जीवन की सभी घटनाएं पहले से ही निर्धारित हैं तो उनको, जिनको बदला ही नहीं जा सकता, जानने की क्या आवश्यकता है।

नक्षत्रों की स्थिति के प्रभावों को कम या नष्ट करने के लिए दो तरह के उपाय तथा कथित पंडितों द्वारा बताएं जाते हैं :-

1. भिन्न-भिन्न तरह के पत्थरों, मोतियों आदि को धारण करना।

2. भिन्न-भिन्न तरह के कर्म काण्ड (जैसे जल में आटा आदि प्रवाह करना, यज्ञ करवाना, पशुओं को अन्न आदि खिलाना, दान करना आदि) करना या करवाना।

1. पर उल्लेखित उपाय बेहद ही अतर्क संगत हैं।

2. पर वर्णित उपाय, इस तरह के कर्म हैं कि जिनका फल कर्मफल सिद्धान्त के अनुसार शुभ ही होता है। इन कर्मों के फल के कारण आने वाली परिस्थितियां कम उग्र भी हो सकती हैं। (यह इस बात पर निर्भर करता है कि इन अच्छे कर्मों का फल हमें जल्द या देरी में मिलता है।) इसलिए इस तरह के कर्मों को नक्षत्रों की स्थित के प्रभावों का कम या नष्ट करने के उपायों के रूप में करना बेहद शोचनीय है व बुद्धि जीवियों के प्रति कटाक्ष है।

मैं एक अन्य साधारण सी बात का यहां उल्लेख करना चाहूंगा। फलित ज्योतिष में भविष्य जानने के लिए जन्म पत्रिका का बहुत प्रचलन है। जन्म पत्रिका में मनुष्य की जन्मकालीन ग्रहादि की स्थित होती है। कोर्इ भी व्यक्ति, वह चाहे फलित ज्योतिष में विश्वास रखता हो व नहीं, यह बात मानने से इन्कार नहीं करेगा कि आत्मा का शरीर से संयोग ही जन्म कहलाता है। अब जिस समय की जन्म पत्रिका बनार्इ जाती है वह तो शरीर के गर्भ से बाहर निकलने का समय है न कि आत्मा के शरीर से संयोग का। आत्मा का शरीर से संयोग तो तभी हो जाता है जब नर का शुक्र मादा के रज्ज से संयुक्त हो जाता है। यानि कि जन्म पत्रिका में दिखार्इ जाने वाली ग्रहों आदि की स्थिति  जन्म (आत्मा का शरीर से संयोग) के तकरीबन नौ माह बाद की होती है यानि कि भविष्य जानने का आधार ही गलत होता है। इस ओर पढ़े लिखे लोगों का ध्यान क्यों नहीं जाता ?