मौलिक ज्ञान

क्या हमारे ग्रन्थों में प्रक्षेप हैं ?

हमारे कुछ धार्मिक ग्रन्थ प्रक्षिप्त हैं। मुख्यत: हमारे वे ग्रन्थ प्रक्षिप्त हैं जिनमें लिखे विचार हमारे समाज के आधार थे। मुख्य रूप से मनुस्मृति, रामायण और महाभारत प्रक्षेपों से भरे पड़े हैं। यह तो कर्इ जगह लिखा मिलता है कि मूलत: महाभारत में 10000 श्लोक थे। इन श्लोकों की संख्या आज 100000 या इससे अधिक है। यह जानते हुए यह कहना अनुचित होगा की आज उपलब्ध 'श्रीमदभगवद् गीता' (जो कि महाभारत का हिस्सा है) प्रक्षेप-रहित है। इन प्रक्षेपों का कारण हमारे उस समय के धर्म गुरुओं द्वारा अपने कमज़ोर विचारों को शास्त्रिय आधार देना था। कुछ विद्वानों ने कोशिश भी की है कि इन ग्रन्थों से प्रक्षेपों को हटाकर ग्रन्थकारों की मूल भावना को उजागर किया जा सके। एक तो इन ग्रन्थों में प्रक्षेपों को छाँटना ही अत्यन्त दुष्कर है फिर इन प्रक्षिप्त ग्रन्थों का प्रभाव आज के मानव पर इतना प्रबल है कि वह अन्यथा सोचने समझने को तैयार ही नहीं होता। ऐसे में विद्वानों द्वारा महत्त्वपूर्ण कृतियों से प्रक्षेपों को हटाने का प्रयास उचित फल देने में समर्थ नहीं हुआ। तीन तरह से किसी मन्त्र अथवा श्लोक के प्रक्षिप्त होने का पता चलता है -

1. हर रचनाकार के लिखने की एक शैली होती है। जैसे कुछ रचनाकार विषय का अन्त-भाग पहले लिख देते हैं और फिर शनै: शनै: उल्लेख करते हुए विषय के आरंभिक भाग में पहुंचते हैं। कुछ रचनाकार एक ही श्लोक में प्रश्न भी करते हैं और फिर उस प्रश्न का उत्तर भी देते हैं। रचनाकार की विशेष शैली को समझने के लिए गहरे अध्ययन और मनन की आवश्यकता होती है। रचना का जो भाग रचनाकार की शैली से मेल नहीं खाता उसे प्रक्षिप्त मान लिया जाता है।

2. किसी विशेष प्रसंग के बीच में यदि कोर्इ विषय से हटकर श्लोक आ जाता है तो उसे रचनाकार का मूल श्लोक नहीं माना जा सकता।

3. रचना के लिखने में रचनाकार की मूल-भावना निहित होती है। रचना का जो भाग रचनाकार की मूल-भावना के विरोध में होता है, उसे रचनाकार का ना मान कर अन्यों का मानना ही उचित है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी ग्रन्थ में एक जगह तो लिखा है कि अन्याय नहीं करना चाहिए और दूसरी जगह लिखा है कि न्याय नहीं करना चाहिए तो इन दोनो बातों में एक तो ज़रूर प्रक्षिप्त है।

इसे मानव जाति का सौभाग्य ही कहना चाहिए कि वेदों में कोर्इ प्रक्षेप अथवा मिलावट नहीं है।

वेदों में प्रक्षेप न होने के निम्नलिखित दो कारण हैं–

(i) वेदों में प्रक्षेपों के लिए बहुत अधिक विद्वता की आवश्यकता है जो अल्पज्ञ जीवों में मिलनी असंभव है।

(ii) ब्राह्मणों ने वेदों की रक्षा के लिए इस तरह के वेद-पाठों से मंत्रों को कण्ठस्थ किया हुआ था कि मंत्रों में एक भी वर्ण (अक्षर) का कम या ज़्यादा करना असंभव था। इसी कारण वेदों का ज्ञान ज्यों का त्यों हम तक पहुंच पाया है।